श्री कृष्ण और जामवंत की युद्ध स्थली जामगढ़ -भगदेई 

श्री कृष्ण और जामवंत की युद्ध स्थली जामगढ़ -भगदेई 

रायसेन म.प्र.

रिपोर्ट -राजेश रजक  रायसेन 

 श्री कृष्ण की ससुराल , स्वमंतक मणि को लेकर श्रीकृष्ण और जामवन्त की युद्ध स्थली,त्रेता ,द्वापर युग का संगम,रामायण और महाभारत कालीन उल्लेखित इतिहास और जामवन्त की गुफाएं। पुराणों में लिखित प्रमाणिक स्थल जामगढ़-भगदेई।

 *क्या क्या है जामगढ़ -भगदेई में-* 

* त्रेता युग मे जामवन्त के हाथों बनाया शिव लिंग मंदिर जो 1000 फिट ऊंचाई पर है जहां वर्ष पर्यन्त जल भरा रहता हैं।

* जामवन्त की गुफा जहाँ 27 दिन तक श्रीकृष्ण और जामवन्त के बीच स्वमंतक मणि को लेकर हुआ।

*जामवन्त के द्वारा अंतिम शिव मंदिर निर्माण जिसके शिखर पर कलश नही रखा पाया।

* जामवन्त के पद चिन्ह ,घुटने के निशान,बैठने के निशान,पत्थर पर लिखा बीजक।

*जामवन्त के खेलने के गिल्ली डंडा जो अलग अलग तालाबो में गड़े हुए है।

* प्राचीन दुर्गा मंदिर जहाँ शेर के पैर के निशान देखे जाते है।

* जामगढ़ -भगदेई ,जो जामबंत और उनके भाई रीछडमल की लीलाओ से भरा पड़ा हैं ,जामबंत ने त्रेता युग से लेकर द्धापर युग तक इसी स्थान पर लीलाए की हैं , 

त्रेता युग का शिवालय और जल गुफा जो 1000 फिट ऊंचाई  पर जहाँ बर्षपर्यंत पानी भरा रहता हैं , जाम्बत की द्धापर की गुफा जहाँ 27 दिन तक श्रीकृष्ण और जाम्बत के बीच भीषड़ युद्ध हुआ ,जामबंत के पद चिन्ह और खजाने का बीजक ,जामबंत के खेलने के गिल्ली – डंडा , भगदेई में जामवंत के हाथो अंतिम निर्माण के शिव मंदिर ,जहाँ विशव की अनोखी शिव जी की मूर्ती , 500 वर्ष प्राचीन लज्जा गोरी का अंम्बा मंदिर जहाँ पुजारी सिर काटकर थाल में रखकर पूजन करता था , प्रचीन बाबड़ी और प्राचीन समाधी जो मन मोह लेती हैं , प्रचीन बाराही माता का मंदिर जहाँ आज भी शेर बरदान मांगने आता हैं ,1949 से आजतक संचालित संस्कृति पाठशाला ,और विंध्याचल पर्वत माला जो बारबार अपनी और आने को आकर्षित करती हैं  जामगढ़ का सच।

रायसेन जिले के बरेली तहसील के यह दो गाव हैं जामगढ़ -भगदेई जो विंध्याचल श्रेणी की तलहटी में बसे हुयें हैं यह भोपाल से 135 और जबलपुर से 175 दूर NH -12 पर खरगोन से उत्तर -पश्चिम दिशा में हैं ,सवसे पहले देखतें हैं 1949 से आज तक चल रही संस्कृति पाठशाला हैं जहाँ 50 बच्चे अध्यन करतें हैं यह ब्रह्मलीन चित्रकूट बाले महाराज जी ने प्रारम्भ की थी जो तालाब के किनारे रमणीय हैं इस तालाव के बीचो बीच गिल्ली हैं और भगदेई के तालाब के बीचो बीच डंडा हैं जिसे जामबंत और रिछड़मल खेलते थे ,यहीं से शुरू होती हैं जामगढ़ -भगदेई का त्रेता -द्धापर युगी सफर –

यहाँ से आधा किलोमीटर सफर कर पहुंचेगे त्रेता युगीन शिवालय और जल गुफा ,इसी मार्ग कर पाषाण बेट -बाल हैं जिसे आज क्रकेट में शामिल हैं यह हजारो साल पुराने हैं ,विंध्याचल पर्वत पर 200 मीटर ऊॅंचाई पर यह बहीं मंदिर हैं सीढ़ी मार्ग से चलतें हैं जहाँ शिवालय ,जल गुफा और गाय गुफा हैं ,आखिर 1000 फिट चढ़ाई चढ़कर त्रेता के शिवालय तक पहुंच गएँ , यहीं हैं प्रचीन शिवालय और यह हैं जल गुफा जहाँ से पुजारी जल भरकर ला रहा हैं और यह गणेश माता पार्वती की खंडित मूर्ती हैं और यह हैं गाय गुफा जहाँ से गाय आती जाती थी यह एक दन्त कथा हैं , गुफा के पास बूँद बूँद करके जल साल भर टपकता हैं सिद्ध स्थान जहाँ एक एक बूँद करके पानी टपकता है जिससे सेवन  करने से दमा.हार्ट .चर्मरोग .कोढ़ जैसे रोग दूर होते हैं / त्रेता युग में जामवंत ने इसी शिवालय की स्थापना की थी ,यहाँ पर आज भी इस जल गुफा मार्ग से जाने पर प्राचीन किला हैं और साधू संत निवासरत हैं लेकिन कौन मौत के मूह में जाना चाहेगा ,यहाँ पर भजन कीर्तन के ध्वनि सुनी जाती हैं , गाय गुफा की दंतकथा हैं की एक गाय रोज गाव के बरेदी (गाय चराने बाला ) की गायो के साथ चरती थी एक दिन बरेदी ने गाय का पीछाकर कर गुफा के अंदर जा पंहुचा जहा साधु संत तपस्या कर रहें थे ,उन्होंने उसे चावल दिए जो बहार आने पर स्वर्ण में बदल गए और उअस दिन से गाय नहीं आई ,प्राकृतिक संरक्षण के कारण धीरे धीरे संकीर्ण होती जा रही हैं

शिवालय से आधा किलो मीटर दूर 200 मीटर ऊंचाई और ऊबड़खाबड़ मार्ग से 700 मीटर चढ़ाई चढ़कर पहुँचते हैं जामबंत की बहीं गुफा जिसमे श्रीकृष्ण और जामवंत के बीच स्यमन्तक मणि की चौरी के कलंक को लेकर 27 दिन तक भीषण युद्ध हुआ था /लेकिन मार्ग में क्योंच के रोएँ शरीर में खुजली और जलन पैदा कर देते हैं हम इस बाला से बचते बचते आखिर जामबंत की गुफा तक पहुंच है गएँ ,यह गुफा अद्भुत और आश्चर्यजनक हैं हम इस गुफा में 80 फिट तक अंदर गएँ और प्राकृतिक क्षय के कारण गुफा संकीणं हो गयी हैं मार्ग पथरो से ढक गया हैं /पुराने लोग इस गुफा के अंदर झुककर एक मिटटी के तेल का पीपा लेकर अंदर जाते थे आधा पीपा ख़त्म होने पर आधा पीपा तेल में लौट आते थे लेकिन गुफा की गहराई नहीं मिली ,इसी गुफा के अंदर जामबंत की बेटी जाम्बन्ति और श्रीक्रष्ण का विवाह हुआ था और उपहार में स्वयमान्तक मणि श्रीकृष्ण को दे दी थी /यह श्री कृष्ण की ससुराल भी हैं।

पुराणो में उल्लेख के अनुसार द्धापर युग में स्वमन्तक मणि सत्राजीत ने सूर्या की तपस्या कर प्राप्त की थी शेर ने सत्राजीत  मार डाला था और शेर के मुह  चमकीली बस्तु देख जामवंत ने शेर  शिकार कर खेलने के लिए अपनी बेटी जाम्वन्ति को दे दी थी श्रीकृष्ण को स्वमन्तक की चोरी का आरोप लगा था इसे ढ़ूढ़ते हुए शेर के पैरो  निशान मिलाते हुए जामबंत की गुफा में पहुंचे और 27 दिन तक भीषड़ युद्ध हुआ और जामबंत भगवान  श्री कृष्ण को पहचान गए और अपनी बेटी का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर उपहार में स्वमन्तक मणि दे दी , इस मणि की विशेषता थी की एक दिन में 8 भार सोना देती थी एक भार यानी 25 किलो सोना ,दिन भर में 200 किलो ,कुल 30 दिन तक गुफा में रही तो लगभग 65 क्विंटल सोना गुफा में हैं जो शोधकर्ता बताते हैं नववी शासन में दूरवीन से देखा गया हैं जामबंत के पद चिन्हो के पास का बीजक के अंतिम शव्द “गुप्ते “का अर्थ गड़ा हुआ धन या खजाना हैं बीजक में छुपा हैं खजाने का रहस्य /

अब चलते हैं जामबंत के पद चिन्हो की और  लेकिन रास्ते में प्राचीन बराही माता का मंदिर जहाँ आज भी माता से आशीर्वाद मांगने आता हैं शेर ,की माता काले सर बाले (इंसान) से सामना न हो ग्रामीण आये दिन आबाजे सुनते हैं और गावं के मवेशियों को कोई नुकशान नहीं होता ,हमने शेर के ताजे पेरो के निशानों को कैमरे  कैद किया /यह स्थान सेकड़ो बर्ष पुराना हैं /

यह हैं जामबंत के पद चिन्ह जो आधा किलोमीटर तक मिलते हैं यह दोनों पैर हैं और यह चलते हुए दायाँ पैर बायां पैर के निशान हैं आगे कूल्हे घुटने और फिर पैरो की निशान हैं ,यह लिखा हैं बीजक यानि खजाने का रहस्य ,यह नो गोटिया खेलने का चंगा बना हैं जिसे दो लोग बैठकर खेलतें हैं /और इसी  बने तालाव में गिल्ली का डंडा हैं जामगढ़  तालाब में गिल्ली और भगदेई  तालाब में डंडा हैं /यह द्धापर युग की पुरसम्पदा समाप्ति की कगार पर हैं इसका कोई संरक्षण नहीं हैं /

 

अब चलते हैं भगदेई जहाँ यह हैं प्राचीन शिव मंदिर जिसे जामबंत ने नग्न होकर बनाया था ,एक किबदन्ती हैं की जामबंत और उनके भाई रीछडमल  इसे बनाया हैं , जामबंत इसे नग्न होकर बनाते थे जब कोई आता था तव बह चक्की चला देता था लेकिन एक दिन जामबंत की बहिन बिना चक्की चलायें आ गयी तो जामबंत ने उसे पहाड़ी पर फैक दिया और  इसी मंदिर से कूंदे जो पैरो के निशान बने यहाँ गिरे और गुफा में चले गए जिसके निशान आधे किलोमीटर तक बने हैं /लेकिन शोधकर्ता इसे 11 बी सदी  बताते हैं गुर्जर प्रतिहार बश का बना हैं / इस मंदिर में कंकाली माँ , यक्ष की मूर्ती और शिव जी की उर्ध्व लिंग संकुल अवस्था की मूर्ती विश्व में कहीं नहीं हैं /

  

रामायण ,और महाभारत काल का प्रमाणिक स्थल जो उपेक्षा का शिकार है।आवश्यकता है इसे सभारने और    संरक्षित करने की

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